Monday, March 12, 2007

Saturday, March 10, 2007

किस पर लिखूं कविता

मैं कुछ चीजों पर कविता नहीं लिख सकता
फुदकती गिलहरियों
कूकती कोयल
आंगन में रखे धान का गट्ठर,पुआल
जलावन की लकड़ियां
भैंस का गोबर
चावल की रोटी
आम का बगीचा
तालाब-पगडंडी
लहलहाते खेत
खेतों में मजदूर
पेड़ों की छाया
ढंडी हवा में सूखता पसीना
कबड्डी
अंजुल भर कर पानी पीना
पेड़ के नीचे सोना
अंगोछा का मुरैठा
घंटी की टनटनाहट, बैलों की
और भी ढेर सारी चीजें
कई ऐसी भी हैं जिन्हें भूलने से डरता हूं
चाहता हूं पर लिख नहीं पाता इनमें
हां......
गांव का मंदिर
बड़ा सा आंगन
चाचा के साथ साइकिल पर जाना
चप्पल की चोरी,पिटाई का डर
बदमाशी-लुकाछिपी
मां के हाथ से खाना, मार भी
अब और याद करने से जी.....
मैं वर्तमान में लौटता हूं
सभी में जीवन था
अब सभी यादें हैं
अब वो आस-पास हैं
उनमें जीवन ढूंढता हूं
जीवन है भी
पैसे की चाह में लगाया गया मनी प्लांट
एलार्म घड़ी
तेजी से गुजरते चेहरे
ठिठ्कन भी नहीं हैं जिनमें
आधी हंसी
टीवी पर तेजी से भागती तस्वीरें
दफ्तर के कंप्यूटर
कंप्यूटर की तस्वीरें
घनघनाते फोन
फड़फड़ाते पन्ने
हिलते हुए बेजान हाथ
इनमें से किसी चीज पर फिर से सोचना नहीं चाहता
कविता भी नहीं लिख सकता इन पे
इनमें से कोई चीज अपनी सी नहीं
बचपन से ताल्लुक किसी का नहीं
दौड़-धूप-अफसोस
कार-घर और पूरी दुनिया नहीं होने
विजयी भाव
राह चलते मुसाफिर के बगल से सर्र से स्कूटर के गुजरने का
और आखिर में
पत्नी का प्यार
पत्नी से प्यार
प्यार में चरम
उसका खिलखिलाना
उसका रुठना
फिर गले से लिपटना
उस समय भूल जाता हूं सब कुछ
हां सब कुछ
बच्चों की कल्पना
उसके साथ खेलने को सोचना
सभी खुशी देती हैं
लेकिन उसकी आंखें
संदेह से पलटती आंखें
फिर मैं लिखना चाहता हूं कविता
फुदकती गिलहरियां
पगडंडी
बचपन से जुड़ी हर चीज पर
पर लिख नहीं पाता हूं.....
इन सब पर एक कविता....कल के लिए.....।

गड्ढे में गिरा बच्चा न्यूज चैनलों की किस्मत से?

भूचाल मचाते टीवी चैनल
जैसे ही न्यूज चैनलों को पता चला कि... कुरुक्षेत्र में एक बच्चा 53 फुट गहरे गड्ढे में गिर गया है.. सभी ने अपने-अपने ओबी वैनों को मौके पर भेज दिया..। बचाव का काम तो दिन में ही शुरू हो गया था .. लेकिन लोगों को ये टीवी पर रात में ही देखने को मिला....। ये अपनी तरह की अलग घटना थी.. लिहाजा टीवी पर इसका प्रसारण रात भर जारी रहा.. और दुनिया के जिन-जिन देशों में भारतीय हिंदी समाचार चैनलों की पहुंच थी.. लोग टीवी के सामने जम गए..। लोगों में उत्सुकता थी.. आखिर कैसे प्रिंस मौत के मुंह से बचकर बाहर निकलता है... । सभी इस घटना को लाइव देखना चाहते थे..। क्या बड़े क्या बच्चे.. सभी रात भर जगे रहे..। बचाव में घंटों लगने थे.. लिहाजा टीवी चैनलों ने लोगों से प्रतिक्रिया लेनी शुरू कर दी...। एक बार फोन आने लगे.. तो फिर ये रुकने का नाम नहीं ले रहा था.. । प्रिंस की सलामती के लिए दुबई, अमेरिका, न्यूजीलैंड समेत न जाने कितने देशों में फोन आने लगे..। भारत में कितने शहरों के दर्शकों ने फोन किया उसकी गिनती नहीं..। कोई कहता.. खुदा ने चाहा तो प्रिंस जरूर बचेगा.. तो कोई कहता ईश्वर ज़रूर बच्चे की मदद करेगा..। लोग फोन पर ही भजन गाने लगे..। इसी बीच किसी पिता की आवाज आती है.. हम लगातार आपके चैनल को देख रहे हैं.. हमारे बच्चे भी साथ बैठे हैं.. और कह रहे हैं.. कि वो तब तक सोने नहीं जाएंगे.. जब तक प्रिंस बाहर निकल नहीं आता..। बच्चे को बचाने की गहरी इच्छा इनमें थी..। जितने भी फोन आए.. हर आवाज में यही इच्छा .. यही कामना थी.. कि किसी भी तरह से प्रिंस बच जाए.. प्रिंस को बचा लिया जाए..।
हर बार दर्शक ये कहना नहीं भूलता था.. कि वो इन चैनलों को बधाई देना चाहता है.. । दर्शक इस बात की भी सराहना कर रहा था.. कि मीडिया इसका लगातार कवरेज कर कितना अच्छा काम कर रहा है..। यूं तो ये कोई उतनी बड़ी घटना नहीं थी.. लेकिन बच्चे को बचाने की कोशिशों ने इसे बड़ा बना दिया...। इस घटना को और भी बड़ा बनाया मीडिया ने.. । जिसके माध्यम से तमाम दर्शकों की संवेदना प्रिंस के प्रति हो गई .. और उनके हाथ प्रिंस की सलामती में उठ खड़े हुए..। जाहिर है.. मीडिया ने साबित किया... कि वो कितना ताकतवर है.. और चाहे तो लोगों की संवेदना को एक दिशा दे सकता है..।